मेरे विचार

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विवेक मनचन्दा


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बाबा रामदेव योग गुरु या ठग ?

Posted On: 24 Apr, 2014  
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भाजपा की कथनी और करनी में अंतर

Posted On: 12 Mar, 2014  
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दल बदलन के कारने नेता धरा शरीर

Posted On: 28 Feb, 2014  
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सहारा और सेबी के बीच शह और मात का खेल

Posted On: 27 Feb, 2014  
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मृत्युदंड का होना जरूरी

Posted On: 19 Feb, 2014  
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“आप” तो ऐसे न थे

Posted On: 17 Jan, 2014  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

आदरणीय श्री विवेक मनचंदा जी, सादर अभिवादन! थोडा सा विवेक दौड़ाइये, गन्गा स्नान करिये मन खुद चंगा हो जायेगा ... एक ही नारा हर हर मोदी घर घर मोदी.... अब तो उन्होंने अपने आपको भविष्य का प्रधान मंत्री भी मान लिया है ... कमल और मोदी ... brahma जी भी कमल पर ही विराजमान होते हैं लक्ष्मी जी भी अब आप स्वयं कल्पना कर लीजिये क्या होने वाला है मोदी लहर है लहर नहीं अंधी है और यह अंधी अब सुनामी में बदलने वाला है ... मुथालिक और साबिर अली को निकलकर इन्होने गलत किया वे सब एक एक सीट तो बढ़ा ही सकते थे. २७० +२ = २७२ ..अगर दो की कमी रह गयी तो रामविलास पिता पुत्र हैं ही उनके भाई भी हैं. डॉ ह्रस्वरधन को तो आपने सुना ही होगा ...अब भगवन भी नहीं रोक सकते मोदी को प्रधान मंत्री बनने से ... अब आप और हम जागरण करते रहेंगे ...कुछ कविता वगैरह भी लिखिए आगे काम आने वाला है या मोदी सर्व भूतेषु राष्ट्र रूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम: का पाठ कीजिये सब ठीक होगा...

के द्वारा: jlsingh jlsingh

“आप” की दस्तक और राजनीति में उनके कार्यो से जो मिसालें पेश हो रही हैं, उनसे राजनीतिक दल सकते में हैं। आज देश में जिस शख्स और पार्टी की चर्चा सबसे जोरों पर हो रही है वह है अरविंद केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी। दिल्ली की जनता ने आम आदमी को चुना और पार्टी सत्ता पर आसीन हो गई। अरविंद केजरीवाल सीएम बन गए और उन्होंने सुरक्षा व बंगला लेने से इनकार कर दिया। यही रणनीति उनके मंत्रियों की भी रही, जो लालबत्ती व सुरक्षा के बगैर जनसंपर्क कर रहे हैं। देश भर में इस सादगी की चर्चा होने लगी। देश में बरसों से सत्ता सीढियों को पाने वाली पार्टियां भी जनता से मिल रही प्रतिक्रिया के चलते सकते में हैं। परिवर्तन की आंधी चली है नकली लालकिला धराशायी हो चूका है दम्भ के स्वर में मधुरता आई है ... भाजपा समर्थक अब आप पर टूटे हैं इसका परिणाम भी आप के पक्ष में ही जानेवाला है.....अब चौरासी कोस और चौरासी लाख कुछ काम नहीं आने वाला है ...आम आदमी जाग चूका है! वंदे मातरम! इंसान का इंसान से हो भाई चारा, यही पैगाम हमारा ... यही पैगाम हमारा....

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: batohi batohi

भाई जी ये सोसियल डाविनिजम है । वैश्विक बेकर धन माफियाओं ने डार्विन नाम के शेर बाजार के आदमी को इसाई मीशीनरियों के साथ देश विदेश घुमाया जानवरों की स्टडी के नाम फिर एक किताब लिखवाई जीसे हम डार्विनवाद कहते हैं । उसे जबरदस्ति का वैज्ञानिक कहा और उस की थियरी को विज्ञानिक खोज कहा । उन को मानवजात एक प्राणी ही है और खासकर बंदर की पैदाईश है वो जनता को बताना था । हम मानव है, हम खास है वो गुरुर निकालना था । समाजवादियों ने उस की थियरी पकडी "जो मजबूत है वोही जीयेगा" राज्य को दखल देना नही है वो कुदरत का नियम है । जो चलता है चलने दो । जनता मरती है मरने दो । साम्यवादियों ने थियरी पकडी आदमी अगर जानवर है तो उसे धर्म की क्या जरूरत है, समाज या कुटुम्ब की भी क्या जरूरत है । आदमी बिलकुल अकेला होना चाहिये तभी वो आदर्श गुलाम बन सकता है । भारत में दोनो थियरी पर उन बेन्कर्स के गुलाम नेता काम कर रहे हैं । उनकी मदद के लिए विदेशी मिडिया भी आ गया है भारत के लोगों के धर्म को छुडाने के लिए । फिल्म और कला जगत पर उन का दबदबा था ही अब समाचार मिडिया भी नंगापन फैला रहा है । उन सबने मिलकर पूरे भारत देश को सेक्समय बना दिया है । एनी बेसेन्ट के प्रेमी की "ड्युअलिजम" थियरी को भी चलाया है । एक तरफ जनता को सेक्स सिखाना, उत्तेजित करना, युवाओं को बलात्कार के लिये उकसाना और दुसरी तरफ कडे कानून के नाम पर लोगों पर केस ठोक देना चाहे बलात्कार हुआ हो या ना हुआ हो। उन दानवों का एजंडा साफ है, भारत के नागरिकों को गुलाम बनाकर भारत पर अधिकार, साम्यवादी विश्व सरकार बनाने के लिए । भारत के बुध्धिजीवियों का एजंडा समज में नही आता है । उन को इतना भी पता नही भारत के दुश्मन कौन है, क्यों नंगा करना चाहते हैं भारत के लोगों को ? क्यों परिवार प्रथा तोडना चाहते हैं क्यों धर्म और रिवाज तोडना चाहते हैं ? क्या न्युजवालों को गंदे केख लिखने का शौक है ? नही जनता डिमांड करती है जनता तो गांलिया देती है ऐसे लोगों को जो यह गंदगी फैलाते हैं ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

अमृत प्रजापति नाम का आदमी एक समय पर आशाराम बापू के आश्रम में नौकरी करता था । शंकास्पद हरकतों के कारण उसे भगा दिया था । उस बात का बदला लेने के लिए आशाराम के खिलाफ बार बार आरोप लगाता रहा है । कुछ साल पहले अमदावाद के बापू के आश्रम से दो बच्चे गुम हो गये थे तो उसमें ईस आदमी ने आशाराम को फंसा दिया था । गुरुवार को उसे राजस्थान की पूलिस अमदावाद से उगाही के केस में पकडकर ले गई है । उस की पत्निका कहना है की पोलिस के साथ आशाराम के चार साधक और दो महिला थी । उसकी पत्नि को डर है की राजस्तान पोलिस उसका ऍन्काउंटर कर देगी । अमदावाद पोलिस का कहना है की राजस्थान पोलिस पूरी कानूनी प्रक्रिया कर के ले गई है हम कुछ नही कर सकते । अमदावाद पोलिस के अनुसार कोटा घुमानपूर की पोलिस ओढव रिन्ग रोड स्थित माधव एवेन्यु में रहे आयुर्वेदिक क्लिनिक पर गई थी । फोन द्वारा धमकी से पैसे मांगने के आरोप में अमृत प्रजापति उर्फ अमृत वैद को गिरफतार कर के ओढव पोलिस स्टेशन में लाया गया था । वहां पूरी कारवाई के बाद ही उसे राजस्थान ले जाया गया है । उस की पत्नि सरोजने बताया की उन को १२ बजे ले गये, चार बजे उन का फोन आया, कहा की मुझे राजस्तान ले जा रहे हैं और मेरे साथ आशाराम बापू के चार साधक भी है । उसने आरोप लगाया है की आशाराम के कहने पर ही पोलिस मेरे पति को उठा के ले गई है, वरना पोलिस के साथ आशाराम के साधक क्यों आते ? पोलिस मेरे पतिका एन्काउंटर कर सकती है । इस मुद्दे को लेकर कल मानव अधिकार पंच में अरजी करुंगी । ---------------------------------------------------- इस समाचार से कुछ बातें निकलती है । इस अमृत की पत्नि क्यों डर गयी ? क्या उसे पता या शक था की उसके पति ने आशाराम को दोबारा फसाया है इस बच्ची के रेपकांड में ? वो पैसे की डिमान्ड किस से करता था, कहीं आशाराम से तो नही ? और कीस बात का पैसा, कहीं रेप केस को वापस खीचने के लिए तो नही ? पोलिस के साथ आशाराम के आदमी क्यों ? जाहिर है इतने बडे उछाले हुए केस के लिए आशाराम के विरोधी राजस्तान सरकार की पोलिस आशाराम की मदद नही कर सकती, नौकरी ही चली जाती । जो हुआ कायदे से हुआ है । आशाराम पर आरोप लगानेवाली लडकी के जाट समाज में आशाराम के लाखों अनुयायी है, बापू के मना करने के बाद भी कुछ तो सामाजिक दबाव आया होगा । बाजी पलट गई होगी । सच सामने आ गया होगा । षडयंत्र कारी आदमी की पहचान के लिए, खूद पोलीस की मदद के लिए आशाराम के आदमी पोलिस के साथ गये हो स्वाभाविक है । आज टीवी की महिला भयंकर भद्दी रीत से आशाराम की भरपूर निन्दा करने के बाद बडे दुःखी स्वर में बोलती थी " अभी तक इस आदमी को पोलिस ने गिरफ्तार क्यों नही किया ?" कोंग्रेसी और वामपंथी नेताओं की होड लगी थी कौन आशाराम को सब से ज्यादा कोसे । अगर आशाराम निर्दोश साबित होते हैं तो इन लोगों मे से किसी को भी एक रत्ती भरका भी अफसोस होगा ? बिलकुल नही, उन को तो एक तरह की खूशी रहेगी की हिन्दुओं को कोसने का मौका मिल गया था और कोस के मजा ले लिया । यही है भारत तेरी कहानी ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

आदरणीय विवेक मनचंदा जी, सादर अभिवादन! आपने नक्सली समस्या को विस्तार से समझाने की कोशिश की है .. निश्चय ही केंद्र और राज्य सरकारों को मिलकर साझा नीति बनानी होगी. विकास में सबकी भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी! जैसा किआप और हम यह देख रहे हैं कि अमीर और अमीर हो रहे है और गरीब और गरीब! देश में हर स्तर पर भ्रष्टाचार का बोल बाला हो गया है ...और इसमें सभी राजनीतिक दल लिप्त पाए जा रहे हैं. गाहे बगाहे बहुत सारे राजनीतिक दल भी इन नक्सलियों से फायदा उठाने की कोशिश करते हैं बदले में संरक्षण देते हैं. इसलिए गहन चिंतन कर समग्र विकास की जरूरत है और सबको शिक्षित भी करना उतना ही जरूरी है ... आपने काफी विस्तारपूर्वक अद्ध्ययन कर आलेख को सबके सामने प्रस्तुत किया है इसके लिए आपको बधाई साथ ही सप्ताह के सम्मानित ब्लोग्गर का दर्जा पाने के लिए विशेष बधाई! आपका लेखन एनी विषयों पर भी विचारणीय होता है ...लिखते रहें ...हमारा धरम और कर्तव्य है लोगों को जगाना और जागरूक बनाना ... जय हिन्द!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

सही कहा अपने , आज मै एक ऐसी रचना लेकर आप सब के सामने उपस्थित हुआ हूँ, जिसे पढ़कर आप सब की आँखे नाम हो जायेगी. और यही हमारे देश की कड़वी सच्चाई भी है, इस कविता के माध्यम से मै ऋषभ शुक्ला, इस समाज का निर्दयी ही सही लेकिन है तो सच. आज हमारे समाज के लोग महिलाओ के प्रती वही पुरानी सोच रखते है जो वह हमेशा रखते आये है, और आगे भी ऐसी ही सोच रखने का इरादा है. गरीब माँ-बाप अपनी बेटियों को बोझ समझते है और वह संतान के रूप में एक बेटा चाहते है, और इसके लिए वह गर्भ में ही जाच के द्वारा उन्हें यदी पता चल गया की गर्भ में बच्ची है तो उसे इस दुनिया में आने से पहले ही मार देते है, उस नन्ही सी जान को जो इस निर्मम दुनिया में आने को बेताब रहती है, उसकी सभी इच्छाओ को भी मार देते है . मै इस कविता के माध्यम से उस छोटी गुडिया के दर्द को आप सब से मुखातिब करने का प्रयत्न कर रहा हूँ. कृपया मेरी गुजारिश है की आप सब इस लिंक को देखे और उसके बारे में कम से कम दो शब्द कहे. यदी कमेंट देने में कोई असुविधा हो तो उसे लाइक करे या वोट करे. http://rushabhshukla.jagranjunction.com/?p=25 शुक्रिया

के द्वारा: ऋषभ शुक्ला ऋषभ शुक्ला

आदरणीय योगी जी ,नमस्कार एवं रामनवमी की हार्दिक शुभकामनायें । मोदी का नाम भले ही मीडिया में चारों तरफ उछल रहा है ।पर दुर्भाग्यपूर्ण बात तो यह है कि भाजपा के ही तमाम नेता ऐसे हैं जो मोदी कि राह का सबसे बड़ा रोड़ा बन सकते हैं।आडवाणी जी 87 वर्ष कि उम्र में भी प्रधानमंत्री बनने कि उम्मीदें पाले हुए हैं।गाहे बगाहे सुषमा स्वराज और अरुण जेटली का नाम भी उछाला जात है ।मोदी के प्रधानमंत्री बनने में सबसे बड़ी अड़चन सहयोगी दलों का मुस्लिम वोट बैंक के लालच में उनका बहिष्कार करना भ है।मोदी सिर्फ एक ही सूरत में प्रधानमंत्री बन सकते हैं जबकि भाजपा अपने बूते पर 250 से ज्यादा सीटें जीत ले ,मगर ऐसा होने कि उम्मीद फ़िलहाल तो लगती नहीं है विवेक मनचन्दा

के द्वारा: विवेक मनचन्दा विवेक मनचन्दा

मोदी को भले ही पार्टी का कार्यकर्ता पसंद करता है और तीसरी बार गुजरात का मुख्यमंत्री बनने पर मीडिल क्लास में उनकी लोकप्रियता बढ़ी हो, लेकिन मुसलमान आज भी उन्हें अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानती है। मोदी के प्रधानमंत्री बनने में सबसे बडा रोड़ा मुसलमान ही हैं। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के सवाल पर बिहार के जानेमाने शिक्षाविद और अल्पसंख्यक नेता अशफाक करीम तल्खी से कहते हैं, “सवाल नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने का नहीं है, बल्कि भारतीय संविधान की रक्षा का है। इसलिए देश की बागडोर ऐसी पार्टी और व्यक्ति के हाथों होनी चाहिए जो संविधान की आत्मा की रक्षा कर सके। लिहाजा, किसी भी सांप्रदायिक व्यक्ति के हाथों देश की सत्ता सौंपने का अर्थ संविधान की आत्मा पर प्रहार जैसा है।”अभी ये सवाल भविष्य के गर्भ में है !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: Madan Mohan saxena Madan Mohan saxena

विवेक जी,आपने प्रस्तुत विषय का गहन अध्ययन किया है ,जिसने हमें महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध करायी उसके लिए आभार स्वीकार करें.बेस्ट ब्लोगर ऑफ़ द वीक की बधाई . विवेक जी ,हमारे देश में सबसे बड़ी समस्या भ्रष्टाचार की है जो हमारे नेताओं के स्वार्थ के कारण दिन बी दिन बढ़ता जा रहा है,देश समस्याओं के रसातल में धंसता जा रहा है.देश का आम आदमी भी अपेक्षाकृत लापरवाह,गैर जिम्मेदार,एवं खुदगर्ज हो चुका है,जिसके कारण कोई बदलाव के असर भी नही दीख रहे हैं.वैज्ञनिक समय समय पर चेतावनी देते रहते हैं और समाधान भी सुझाते रहते हैं परन्तु जब तक दुनिया का प्रत्येक इन्सान जागरूक नहीं होगा स्थिति बिगडती ही जाएगी.

के द्वारा: SATYA SHEEL AGRAWAL SATYA SHEEL AGRAWAL

आदरणीय विवेक जी, सादर अभिवादन! सर्व प्रथम आपको 'बेस्ट ब्लॉगर ऑफ़ द वीक' और महत्वपूर्ण जानकारी देती हुई आलेख के लिए बधाई. वाकई आपने गम्भीर समस्या की तरफ ध्यान आकृष्ट कराया है और काफी मिहनत के साथ सभी आंकड़े जुटाए है. दिक्कत यही है की हम सभी केवल चिंता ही जाहिर कर सकते हैं. सरकारें भी चिंतित होने का रोना रोती है. पर समाधान की तरफ तो ध्यान ही नहीं जाता किसी का! किसी भी समस्या को विष्फोटक की हद तक पहुँचने दिया जाता है...फिर भी बयानवीर उल जलूल बयान देकर लोगों का गुस्सा और बढ़ाते हैं ... अभी हमारे देश में आईपीएल जरूरी है या दो वक्त की रोटी और पीने को पानी. स्वीमिंग पूल जरूरी है या गंगा आदि नदियों की सफाई, जब अंधेर नगरी और चौपट राजा और मूक प्रजा हो वहां यही सब होना है! आपके यथार्थपरक आलेख के लिए बधाई !

के द्वारा: jlsingh jlsingh

विवेक जी, सही कहा आपने की पानी किसी फैक्ट्री में नहीं बनाया जा सकता. जल का संरक्षण व संचयन ही इस अनमोल धरोहर को खोने से रोक सकता है. वर्तमान में भी बहुत साडी पद्धतियाँ हैं पानी के संरक्षण के लिए जैसे की रूफ वाटर हार्वेस्टिंग. किन्तु सबसे कारगर उपाय है की जल को बहने से रोकना. और शायद इसीलिए पुरातनकाल में लाखों की संख्या में कूपों, बावडियों और तालाबों का निर्माण कराया जाता था. कालांतर में इनकी महत्ता कम हुई और प्रतिफल में पानी की आग से हम सब झुलस रहे हैं. समय अब भी है की हम पानी के महत्व को समझे और इसके संरक्षण में सक्रिय योगदान दें. अन्यथा की स्थिति में सब के सब इस काल के गाल में सामने के लिए लाइन में खड़े मिलेंगे. एक सार्थक और थाथ्यपरक लेख और बेस्ट ब्लोगर के लिए हार्दिक बधाई !! अजय यादव

के द्वारा: youngajay youngajay

गंभीरता से देखें तो पाएंगे कि तर्को, तथ्यों और हकीकत के धरातल पर वाकई हम खतरनाक हालात की ओर बढ़ रहे हैं।पानी की कमी की बात करते ही एक बात हमेशा सामने आती है कि दुनिया में कहीं भी पानी की कमी नहीं है।धरती से पानी खत्म हो गया तो क्या होगा। कुछ ही सालों बाद ऐसा हो जाए तो ताजुब नहीं होना चाहिए। भूगर्भीय जल का स्तर तेजी से कम हो रहा है। ग्लेशियर सिकुड़ रहे हैं। यही सही समय है कि पानी को लेकर कुछ तो सोचा जाए। पानी खत्म हो गया तो कैसा होगा हमारा जीवन। आमतौर पर ऐसे सवालों को हम अनसुना कर देते हैं और ये मान लेते हैं कि ऐसा कभी नहीं होगा। गंभीरता से देखें तो पाएंगे कि तर्को, तथ्यों और हकीकत के धरातल पर वाकई हम खतरनाक हालात की ओर बढ़ रहे हैं। पानी की कमी की बात करते ही एक बात हमेशा सामने आती है कि दुनिया में कहीं भी पानी की कमी नहीं है। दुनिया के दो तिहाई हिस्से में तो पानी ही पानी भरा है तो भला कमी कैसे होगी। पर मानवीय जीवन जिस पानी से चलता है उसकी मात्रा पूरी दुनिया में पांच से दस फीसदी से यादा नहीं है। नदियां सूख रही हैं। ग्लेशियर सिकुड़ रहे हैं। झीलें और तालाब लुप्त हो चुके हैं। बहुत सुन्दर , सटीक और आम भारतीय के सीधा जुदा हुआ लेखन दिया है आपने श्री विवेक जी और जागरण जंक्शन ने इसके लिए आपको पुरस्कृत भी किया है ! बहुत बहुत बधाई !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: Lahar Lahar

आदरणीय जवाहर भाईसाहब ,नमस्कार भाजपा की हालत आज कांग्रेस से भी ज्यादा ख़राब है।मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के नाम पर ही पार्टी में एकराय नहीं है।भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कांग्रेस को घेरते -घेरते वह खुद इसी मुद्दे पर मुहं की खा चुकी है।इसका एक पूर्व अध्यक्ष तिहाड़ में है और दुसरे को गड़बड़ी(गडकरी) मज़बूरी में अध्यक्ष पद छोड़ना पड़ा था।इसके साथ ही उत्तर प्रदेश में विधान सभा चुनावो के दौरान बाबूसिंह कुशवाहा जैसे भ्रष्ट लोगों को पार्टी में शामिल करने पर भी भाजपा की अच्छी- खासी फजीहत हुई थी।झारखण्ड में भी भ्रष्ट शिबू सोरेन के साथ सरकार बनाने पर भी भाजपा की काफी आलोचना हुई थी ।आज वह केंद्र में सत्ता में आने के स्वप्न तो देख रही है मगर इस बात से बेपरवाह है की जब तक जमीनी स्तर पर वह खुद को मजबूत नहीं बनाएगी तब तक उसका केंद्र में आना मुश्किल ही नामुमकिन भी है । विवेक मनचन्दा,लखनऊ

के द्वारा: विवेक मनचन्दा विवेक मनचन्दा

वैसे अखिलेश सरकार के लिए आरोपितों को संरक्षण देना कोई नई बात नहीं है। उन्होंने वहीं काम किया है जो उनके पिता मुलायम सिंह यादव किया करते थे। अखिलेश जब गद्दी पर बैठे उसके तीन महीने के भीतर ही जेल में बंद कई अपराधियों को बाहर पहुंचाने का बंदोबस्त कर दिया गया था। राजा भैया को मंत्री बनाकर जो शुरुआत हुई थी वह रुकी नहीं. 15 मार्च, 2012 को अखिलेश का शपथ ग्रहण हुआ और 17 मार्च तक अमरमणि त्रिपाठी और अभय सिंह जैसे अपराधियों का उनके गृह जिलों में पुनर्वास कर दिया गया था । अभय सिंह के ऊपर लगा गुंडा एक्ट सरकार के इशारे पर वापस ले लिया गया है। विवेकजी, मैंने काफी पहले ही इसको लेकर आशंका जताई थी कि समाजवाद का जो चेहरा मुलायम कुनबा दिखा रहा है उसमें इसी तरह का माहौल बनना था। अखिलेश यादव में युवा जोश देखा जा सकता है परंतु शायद वे भी उसी परिपाटी को अंगीकृत कर रहे हैं। जाहिर है कि इसमें इसी तरह के परिणाम आने हैं। किनका हौसला बढ़ाना है और किनको कहां भेजना है इसका निर्णय लेने में वे कतरा रहे हैं या जानबूझकर अनदेखी कर रहे हैं। जिसकी परिणति कई रूपों में दिख रही है। धन्यवाद...

के द्वारा: bebakvichar, KP Singh (Bhind) bebakvichar, KP Singh (Bhind)

आदरणीय विवेक जी, सादर अभिवादन! बजट का 'सार' पढ़कर अच्छा लगा! आम आदमी तो आम ही रहेगा, क्योंकि यह न तो वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल होता है न ही वोट देने में रूचि रखता है! कुल मिलाकर इसे संतुलित बजट बताया है बहुत सारे अर्थशास्त्रियों ने! शेयर बाजार ऐसे ही बढ़ता घटता रहता है इसमे भी फायदा बड़े लोग ही कमाते हैं आम आदमी तो अपनी गाढ़ी कमाई डुबाता ही है! अगर इस बजट का दूरगामी परिणाम होता है तो सबको फायदा होगा अन्यथा कांग्रेस जायेगी तो भी शायद दूसरे दलों का फायदा होगा. इसलिए चिंता करने की कोई बात नहीं है. भ्रष्टाचार से जिस दिन मुख्ति मिल जायेगी समझिये यह देश फिर से सोने की चिड़िया बन जाएगा!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

आदरणीय विवेक मनचंदा जी, सादर अभिवादन! आपके लेख को मैंने काफी विलम्ब से पढ़ा इसका मुझे खेद है! आपने शब्दों और चित्रों के माध्यम से जो दृश्य उपस्थित किया है - सचमुच कलेजा मुंह को आ जाता है! शुरुआत आपने कुम्भ नगरी से की जहाँ स्वर्ग और नरक दोनों है! यही पर सरकारी और गरीब अमीर की खाई साफ़ दिखती है. गरीबों का हाल और निकम्मों का हाल सचमुच बदहाल है! बहुत हद तक हमारा तन्त्र जिम्मेदार है इसके लिए! हम इतना तो कर ही सकते हैं किखुद अन्न को बर्बाद न करें! अगर सम्भव हो तो किसी की सहायता कर दें! पर निर्धन को निकम्मा न बनायें उन्हें काम भी दें और बदले मी मिहनताना दें मनरेगा जैसी योजनायें उन्ही लोगों के लिए है पर उसमे ब्याप्त भ्रष्टाचार पर हम और आप क्या कहेंगे? हमारी सरकारें और जनप्रतिनिधि सब जानते हैं पर ऑंखें मूंदे रहते हैं सत्ता का स्वाद ही शायद ऐसा है! आपका आलेख बहुत उपयुक्त, विचारणीय, चिंतनीय और सूचनापरक है!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

आदरणीय विवेक जी सादर नमस्कार , मैंने आपका लेख '' यह द्रश्य देखकर कलेजा .....''। पढ़ा विवेक जी हमारे देश में गरीबी और भूखमरी के जिम्मेदार जितने नेता हैं उससे ज्यादा कहीं गरीब जनता है मेरी जिन्दगी का यह अनुभव है कि हमारे देश में गरीब कम निकम्मे ज्यादा भरे पड़े हैं । हमारी आफिसर कालोनी में जितनी भी आया हैं उनके परिवार में हराम का बैठकर खाने वालों की संख्या कहीं ज्यादा है इसलिए गरीबी है ,कोई भी काम करने को राजी नहीं होता बस फ्री का खाने को दे दो । विवेक जी मेरा मानना है कि हमारे देश में काम की कोई कमी नहीं है बल्कि काम करने वालों की है । उससे ज्यादा कहीं हमारे नेतागण महान हैं वोटों के चक्कर में बेरोजगारों को काम देने की बजाय खैरात बाँटने में लगे हैं और निकम्मों की संख्या में और भी इजाफा कर रहे हैं ।

के द्वारा: Manisha Singh Raghav Manisha Singh Raghav

अशोक जी,सादर नमस्कार ,आपकी प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत शुक्रिया।आज देश के हर हिस्से में नाबालिगों द्वारा किये जाने वाले अपराधों में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है।आपको याद होगा कि बलात्कार के एक मामले में धनञ्जय चटर्जी नामके अपराधी को फाँसी भी हुई थी पर क्या हुआ ?दिल्ली बलात्कार काण्ड के बाद अपराधियों को फाँसी देने कि मांग हो रही है,नाबालिगों की उम्र घटाने की मांग हो रही है?कल को कोई 16 वर्ष का नाबालिग कुछ कर देगा तो फिर नाब्लिगों कि उम्र 14 वर्ष करने कि मांग होगी । मुरादाबाद में एक चौकाने वाला मामला सामने आया है ।जहाँ क्लास बंक कर 7वीं के स्टूडेंट्स ने सेक्स किया ।फिल्मों और टीवी सीरियल्स, मोबाइल आदि के जरिए परोसी जा रही अश्लीलता बच्चों के दिलो-दिमाग पर खासा असर डाल रही है। वे कम उम्र में भी शारीरिक संबंध बनाने को उतावले हो रहे हैं। कांशीराम नगर 14 वर्ष के छात्र और 13 वर्ष की छात्रा के अश्लील हरकत करते पकड़े जाना इसकी ताकीद करता है कि इस उम्र में बच्चों पर विशेष ध्यान देना जरूरी है।

के द्वारा: विवेक मनचन्दा विवेक मनचन्दा

मनचंदा जी आपने बहुत ही सटीक चित्रण किया है इस जघन्य अपराध के बाबत और अपराध करने वाले को कभी बालिग या नाबालिग का नाम देकर कानून को अपराध की सजा से छूट देने की बात कहना पिदित्ता एवं उसके परिवार के साथ बहुत बड़ी नैन्सफी कही जाएगी उस लड़के के स्कुल प्रमाण पात्र के आधार पर उसको नाबालिग कहना सरासर इंसाफ का खून कहा जायेगा अतः इस पूरे मामले में अपराध की श्रेणी को मद्दे नजर रखते हुए किसी फैसले पर अदालत को पहुचना चाहिए क्यूंकि ऐसे जन्म प्रमाण पात्र अपराध करने वाले कुछ पैसे देकर प्राप्त कर सकते हैं अक्सर देखा गया की अपराधी जो जेलों में बंद हैं वे बीमारी का बहन बनाकर जेल से अस्पताल में और अस्पताल से मौज मस्ती करने निकल जाते हैं और इसमें उनकी मदद डाक्टर पेशे में कार्यरत लोग ही करते हैं अतः अपराध कितना बड़ा है और उससे समाज में क्या सन्देश जाता है समाज में क्या प्रभाव पड़ता है इस बात का ध्यान न्यायालय और कानून को जरुर रखना चाहिए जो लड़का या लड़की जघन्य अपराध कर सकता है ऐसा अमानवीय ब्यवहार कर सकता है उसको नाबालिग बताकर फिर से अपराध करने के लिए आजाद छोड़ना पीड़ित परिवार के साथ बहुत बड़ी नैन्सफी कही जाएगी और आपने सही लिखा है अपने देश का कानून इतना अँधा है की वह यदि कसब भी नाबालिग होता तो उसको भी बरी कर देता यह कहाँ तक न्यायसंगत है इस को भी अपने देश के कानूनविदों एवं सर्वोच्च न्यायलय को सोचने की जरुरत है अपराधी की उम्र की चर्चा ही नहीं होनी चाहिए इससे समाज में गलत सन्देश जायेगा और लोग ऐसे नाबालिगों का इस्तेमाल इन अपराधों के लिए करते नजर आयेंगे जो देश और समाज के लिए बहुत घटक होगा आपको एक अच्छा और सटीक ब्लाग लिखने पर बधाई

के द्वारा: ashokkumardubey ashokkumardubey

आपकी सभी बातें सारगर्भित हैं परन्तु देश में मोदी अकेले नेता हैं जो भारत का विकास कर सकते हैं जो की बहुत मुस्किल नहीं है हमें प्राकर्तिक रूप से भगवान् ने सारे संसाधन दिए हैं बस हमें एक अच्छे और कुशल नेतृत्व की आवश्यकता है ! मोदी नेताओं के कूड़ेदान से निकला हुआ एक हीरा है जो इन गंदे और भ्रष्टाचार से दूषित नेताओं को जीतने की पूरी क्षमता रखता है ! मेरी अपनी राय में कांग्रेश तथा अन्य दलों में व्याप्त भ्रष्टाचार को ख़तम करना एक युद्ध जीतने के बराबर है जो किसी राजनेता के बस में नहीं राजा के बस में है जो ज्यादा फालतू बातों में ध्यान न देता हो जो स्वभाव से सन्यासी हो विलासी नहीं ! मैं सच बताऊं तो मुझे लगता ही नहीं वरन पूरा विश्वास भी है जो खलबली बीजेपी , जनता दल (यु) से कांग्रेश तक दिखाई देती है ये युग परिवर्तन की आहट है भारत का भविष्य बनाने वाला आ चुका है जो हर हमारी हर लड़ाई को जीत में बदल देगा !

के द्वारा: dhirchauhan72 dhirchauhan72

मदन मोहन जी,आपकी प्रतिक्रिया के लिए साधुवाद, भारत में आज एक अध्यात्म ही ऐसी विषय है जो टैक्स फ्री है , और इस चोखे धंधे में प्राफिट भी बहुत है |तभी तो आज देश में न जाने कितने बाबा , महात्मा और मठाधीश इस धर्म रूपी आध्यात्मिक विषय को व्यावसायिक रूप देकर फल फूल रहे हैं |यहाँ की जनता भी ऐसी है जो कम से कम धर्म और आस्था केनाम पर एकजुट हो जाती है |यह धर्म वास्तविक अध्यात्म ज्ञान के रूप में न हो कर चमत्कारिक रूप को लेकर ज्यादा सफल है ,क्योंकि अध्यात्म के व्यवहारिक ज्ञान की जगह आज बाबाओं का चमत्कार ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है | आज हमारे देश में भक्ति और अध्यात्म की बाढ़ सी आ गयी है | आज इस अध्यात्म को हमारे चैनलों ने सर्व सुलभ बना दिया है | जिस अध्यात्म की खोज में हमारे ऋषि मुनि पहले जंगल पाषाण और कंदराओ में भ्रमण करते थे उसी भक्ति और अध्यात्म को आज सूचना की क्रांति ने व्यक्ति के बेडरूम में प्रवेश करा दिया है | यह भी एक वैश्वीकरण का ही अंग है |ऐसा नहीं की यह अध्यात्म का उन्नत प्रसार त्वरित प्रक्रिया है गत एक दशक सेतो हमारे देश में इन्हीं टीवी चैनल्स के पूरी तरह सक्रिय होने के बाद तो लगता है भारत में अध्यात्म की गोया बाढ़ आ गई हो। पूरे देश में चारों ओर जहां भी जाईए और जो भी चैनल देखिए उनमें ज्य़ादातर तथाकथित अध्यात्मक गुरू आपको धर्म,अध्यात्म,जीने की कला,स्वास्थ्य तथा राजनीति का घालमेल,योग शास्त्र आधारित उपचार आदि न जाने क्या-क्या परोसते दिखाई देते हैं। इन कथित अध्यात्मिक गुरुओं के समक्ष जो भीड़ बैठी दिखाई देती है उसे देखकर तो ऐसा प्रतीत होता है गोया पूरा देश ही इन कथित अध्यात्मिक गुरुओं की ही शरण में जा चुका है| क्या आपको आश्चर्य नहीं होता कि जहाँ एक साधारण नौकरी पेशा या बिजनेस करने वाले व्यक्ति को कितनी मेहनत करनी पड़ती है दो पैसा कमाने और अपने बाल बच्चों की अच्छे ढंग से परवरिश करने और साधारण मकान बनाने के लिए परन्तु ये धर्म का धंधा करने वाले पंडित, पुजारी, साधू, सन्यासी, कथावाचक कितनी जल्दी इतना पैसा कमा लेते हैं और आलीशान महल खड़े कर लेते हैं | वो भी कम समय में धर्म और भगवान के नाम पर | कहाँ से आता है इतनी जल्दी और इतना पैसा इनके पास?

के द्वारा: विवेक मनचन्दा विवेक मनचन्दा

आदरणीय विवेक मनचंदा जी, 'बेस्ट ब्लॉगर ऑफ़ द वीक' के लिए हार्दिक बधाई ! 'बलात्कार से बचाव जागरूकता और सतर्कता ही है' तथा '10 दिसंबर-मानवाधिकार दिवस' पर अत्यंत प्रासंगिक, अत्यंत आवश्यक, शोधपूर्ण पठनीय आलेखों के लिए हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! ------ "खून से तराशे जो खून के धब्बे हैं, खामोश चीखों उनमें कई कैद पड़ी है, एक बार फिर। मर्दानगी को तुमने तो मजमा बना दिया, अब दोजख में भी दो गज जमीन ना मिलेगी, एक बार फिर। ऐसे दरिंदों के लिए फांसी की सजा बहुत कम हैं इन्हें उम्र भर तड़पाया जाए तो भी कम होगा। उन्हें ऐसी सजा दी जानी चाहिए ताकि ऐसा कुछ करने से पहले उनकी रूह तक कांप जाएं।" xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx "10 दिसंबर यानी मानवाधिकार दिवस। एक ऐसा दिन, जब आप और हम अपने अधिकारों की बात करतें हैं। दरअसल ये अधिकार हमारी बुनियादी जरूरतों से जुड़े हैं। इंसान होने के नाते हमें भूख और प्यास लगती है, जीवन से जुड़ी सुख-सुविधाओं की जरूरत होती है, अपनी सत्‍ता चुनने की आजादी होती है, अपने विचारों को कहने की आवश्यकता होती है। ये जरूरतें तभी पूरी होती हैं, जब हमें मानवाधिकारों के उपयोग की पूरी आजादी दी जाती है। हालांकि मानवाधिकारों को लेकर विवाद भी रहता है। सजायफ्ता कैदियों, आतंकियों और विद्रोहियों के मानवाधिकार की बात होती है तो कई लोगों की त्यौंरियां चढ़ जाती हैं।"

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

Dear Vivek, The Delhi episode has rightly exploded the suppressed anger. However, following aspects are missing: Earlier the education system gave a lot of importance to Ethics, Moral Values and DHARM (not religion), but it is no more in vogue. Who is responsible?; The material-getting social sanction- being served by Cinema, TV and the Ads, depicting the ladies as sex object, has removed the differentiation between obscene and cultured thinking/art. Why there is no protest by the cultured society?; A junior was sodomized in the name of RAGGING, who committed suicide. Society and The Judiciary remained mute spectator. Why? Women were abducted, molested, and raped in presence of their kith & kin during 1947 in Pakistan, which was repeated in B'desh and even in Kashmir Valley. Was there a befitting protest? Attempts were made by the national leaders to undermine them, making the public indifferent to such crimes. Who boycotted such leaders? why not? Anger is against the POLICE inaction. Is it not true, that the political interference and Judicial inaction associated with corruption and manipulations by advocates, made a KABADA of policing? This has resulted in the lower rung police force to be corrupt to core for obliging their bosses, for fulfilling the illegitimate demands of their family members, and to help the anti socials. Will it see the light of reform? A case of misconduct by a Judge was debated in Parliament but defeated. A Delhi Judge was found keeping files of a builder/property dealer at home. A few Judges were found enjoying the company of women lawyers, perhaps in Mysore. A Judge was reported to have taken an awesome amount of one crore as bribe. The NYAYMOORTIES are found sitting like real MOORTIES and the advocates play tricks to drag cases indefinitely. It was reported that bribe is rampant in High Courts for getting the case listed for hearing. All such aberrations have resulted in piling of cases in Lacs, but the insensitive MY LORDS And the COURT OFFICERS (Advocates) are enjoying at the cost of society, working hardly 100 out of 365 days in a year. It is resulting in enormous national waste in the shape of HUMAN RESOURCE that is busy without any productive work, along with creation of a sense of frustration and indifference to social duties, in the citizens. Fear psychosis emanating from unbridled Judiciary is such that no one dares talk about this evil, not even those oldies who are struggling for the last 10s or 20s of years for realising their earnings. Shall the anger against the culprit and the Police bring an end to such brutal crimes as seen in Delhi Bus? Above facts demand reforms and actual reforms in Politics, Judiciary, Policing, Education, Places of worship, Cinema, TV and the Home (the first school being the home).........., if we want to eradicate the evils. We will have to discipline ourselves as well and stop LIVE IN RELATIONSHIP, appreciation for half clad, i.e. half naked women on screen/magazines etc.; The Govt, which is controlling every aspect of society, and hence the only agency responsible for stopping crimes, shall have to take the lead for above reforms. The Judiciary should not act like Politicians who introduce one or two measures to prop up their image and win election. Exemplary decisions in isolated cases needs discouragement, rather it should be on a regular basis. All the courts should be FAST TRACK. The CJI/Law Ministry should invite suggestions from the public for reforms in this regard. There should be a permanent Ambudsman in this regard, where complaints/suggestions should be entertained and monitored for implmenteation. There is a administrative reforms commission. It must be galvanized to ensure proper redressal of public grievances of all sorts, which has so far proved itself nothing else than a white elephant. Shall we wake up? With good wishes, Ramesh Nigam

के द्वारा: Ramesh Nigam Ramesh Nigam

विवेक जी , नमस्कार ," बेस्ट ब्लॉगगर ऑफ़ दी वीक " बधाई स्वीकार करें । विवेक जी कहीं न कहीं नेताओं की बात से मैं पूरी तरह सहमत हूँ ज्यादातर बलात्कार की जिम्मेदार लडकियाँ और उनके माता पिता ही हैं जो फैशन की राह पर चलते हुए अपने कपड़ों की तरफ ध्यान नहीं देतीं उसमें आदमियों की तो क्या बात करें औरतों तक की निगाह नहीं हट पाती । दिल्ली में जो अभी हाल ही में घटना घटी उस घटना के कुछ सवाल मेरे दिमांक में बार बार आ रहे हैं जिनका जबाब मुझे नहीं मिल रहा अगर आपको मिल जाये तो मेरे ब्लाग पर उनका उत्तर जरुर देना । पहला सवाल --- लडकी जिस बस में सफर कर रही थी क्या उसमें इन चंद गुंडों के अलावा और कोई यात्री क्यों नहीं था ? पूरी बस खाली क्यों थी ? दूसरा सवाल ---- उस रात वह अपने बॉय फ्रैंड के साथ इतनी रात को पिक्चर देखने निकली ही क्यों ? अगर निकली तो ऑटो लेना था क्या उसे वही खाली बस मिली जिसमें गुंडे ही थे । औरत को भगवान ने आदमी को परखने की नजर दी होती है वह एक निगाह में ही आदमी की नजर परख लेती है \ तीसरा सवाल --- अभी तक बॉय फ्रैंड कहाँ है उसके बारे में जिक्र कोई जिक्र क्यों नहीं कर रहा ? ऐसे बहुत से सवाल हैं जिनका मुझे उत्तर नहीं मिल रहा ।

के द्वारा: Manisha Singh Raghav Manisha Singh Raghav

राजनीति अपनी जगह है और आज सरकार को पाक से इस मसले पर दो टूक बात करनी चाहिए कि आख़िर वह चाहता क्या है क्योंकि यदि हिन्दू पाकिस्तान में रहना ही नहीं चाहते हैं तो उनके लिए सम्मान से जीने के अन्य रास्ते बंद तो नहीं किया जा सकते हैं ? जब हम तिब्बत से आये दलाई लामा को मानवता के नाम पर शरण दे सकते हैं और 1971 में आये या उसके बाद घुसपैठ से आये बांग्लादेशियों के साथ भी हमारा व्यवहार सामान्य ही होता है तो आख़िर इन हिन्दुओं की क्या ग़लती है जिनके पूर्वजों ने जिन्ना की बातों पर भरोसा करके पाक को ही अपना घर मान लिया था ? संसद और सरकार को इन हिन्दुओं के मसले को पाक से कड़े शब्दों में उठाना चाहिए और इस मसले पर राजनीति के चश्मे उतार कर रख दिए जाने चाहिए क्योंकि यह मसला धर्म का नहीं बल्कि अल्पसंख्यकों को जड़ से मिटाने का है और आज भारत इतना सक्षम है कि अगर वह चाहे तो पाकिस्तान में बचे हुए सभी हिन्दुओं, सिखों और ईसाइयों को अपने यहाँ अच्छे ढंग से बसा सकता है। आपने बहुत गंभीर विषय पर अपनी लेखनी चलायी है ! पाकिस्तान का हिन्दू , वहां का दोयम दर्जे का नागरिक बन गया है किन्तु वहां ऐसे भी हिन्दू हैं जो राजनीती में अपना महत्व रखते हैं ! लेकिन जैसा की हमारे समाज में होता आया है कोई एक दूसरे के साथ खड़ा नहीं होना चाहता है ! बहुत बेहतरीन लेख

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat




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